
उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और सरकार की नीतियों को लेकर एक बार फिर सवाल उठाए गए हैं। स्वास्थ्य मंत्री से मिलने पहुंचे प्रदर्शनकारियों ने प्रदेश में सरकारी अस्पतालों की बदहाली, निजी अस्पतालों के बढ़ते प्रभाव और स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर सरकार से जवाब मांगा।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि राज्य गठन के इतने वर्षों बाद भी प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था आम जनता की जरूरतों के अनुरूप विकसित नहीं हो पाई है। उन्होंने आरोप लगाया कि आज अधिकांश सरकारी अस्पताल रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं, जबकि गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए मरीजों को बड़े शहरों या निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है।
स्वास्थ्य मंत्री से नीतियों पर मांगा जवाब
प्रदर्शनकारियों ने स्वास्थ्य मंत्री से सवाल किया कि राज्य बनने के बाद अब तक प्रदेश के लिए कौन-कौन सी स्वास्थ्य नीतियां बनाई गईं और उनका आम जनता को कितना लाभ मिला। उन्होंने कहा कि नीतियां नेताओं, मंत्रियों और विधायकों के हितों को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि प्रदेश की जनता की जरूरतों के अनुसार बनाई जानी चाहिए।
उन्होंने आयुष्मान कार्ड योजना को लेकर भी सवाल उठाते हुए पूछा कि इससे उत्तराखंड के लोगों और प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को वास्तविक रूप से कितना लाभ मिल रहा है।
उत्तराखंड में स्थापित एम्स जैसे बड़े स्वास्थ्य संस्थानों को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि इन संस्थानों में उत्तराखंड के लोगों को रोजगार, उपचार और अन्य सुविधाओं का कितना लाभ मिल रहा है, इसका स्पष्ट जवाब सरकार को देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रदेश में बड़े-बड़े अस्पताल तो स्थापित किए गए हैं, लेकिन सरकारी अस्पतालों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
अस्पतालों में बेड और सुविधाओं की कमी का आरोप
प्रदर्शनकारियों ने दून अस्पताल, सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी और कोरोनेशन अस्पताल समेत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप है कि मरीजों को समय पर बेड नहीं मिलते और गंभीर परिस्थितियों में लोगों को रेफर कर दिया जाता है।
उन्होंने कहा कि आए दिन गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों से जुड़ी घटनाएं सामने आती रहती हैं, जो प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर स्थिति को दर्शाती हैं।
सुराज सेवा दल के प्रदेश अध्यक्ष रमेश जोशी का कहना है कि वे स्वास्थ्य मंत्री से विरोध मात्र करने नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों और दावों पर तथ्यात्मक जवाब मांगने आए हैं। उन्होंने कहा कि जब तक प्रदेश की स्वास्थ्य नीति स्पष्ट और जनहित आधारित नहीं होगी, तब तक सरकार के खिलाफ सवाल उठाते रहेंगे।




